अध्याय 155: शंकाओं से भरा

ऑस्टिन कसकर बंद दरवाज़े को घूरता रहा। उसने मुट्ठी उठाई, जैसे अभी दरवाज़ा पीट देगा, लेकिन उसका हाथ हवा में ही ठहर गया—नीचे आ ही नहीं पाया।

एला के अभी-अभी कहे शब्द उसके कानों में गूँज रहे थे।

“बस चले जाओ! अब हम कभी पहले जैसे नहीं हो सकते!”

क्या वाकई… कभी नहीं? ऑस्टिन के सीने में तेज़ चुभन उठी।

आज ...

लॉगिन करें और पढ़ना जारी रखें